भारत के कानून पर बात करने की जरूरत?

नई दिल्लीः आखिरकार निर्भया दुष्कर्म से जुड़े दरिंदों को फांसी हो गई। इससे जहां मानव संवेदनशीलता से जुड़े लोगों को राहत मिली, वहीं तथाकथित मानवाधिकारवादी दुखी भी हुए। लेकिन अब किसी की परवाह किए बिना दुष्कर्म व हत्या और देशद्रोह जैसे मामलों में उन विकल्पों को खत्म करने की जरूरत है, जो सुप्रीम कोर्ट से फैसला हो जाने के बावजूद फांसी टालने के लिए रिव्यू एवं क्यूरेटिव याचिकाएं और फिर उनके निपटारे के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करते रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि दोषियों को कानूनी विकल्प मौजूद रहने तक सजा नहीं दी जा सकती।

अलबत्ता यह सही है कि भारत की न्याय वयवस्था अंतिम समय तक मृत्युदंड पाए दोषी को अपना बचाव करने का विकल्प देती है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि मृत्युदंड को लंबे समय तक टाला जाता रहे। इस परिप्रेक्ष्य में दोषियों के वकीलों को भी यह सोचने की जरूरत है कि फांसी को लटकाने के उपाय करना, न्यायालय का समय जाया करने के अलावा कुछ नहीं है।

दुष्कर्म व हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए कानून तो सख्त बन गया लेकिन परिणाममूलक नहीं निकला। जबकि बलात्कार और फिर हत्या के मामलों को जल्द निपटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर त्वरित न्यायालय भी अस्तित्व में आ गए हैं। कई न्यायालयों ने ऐसे जघन्य अपराधों में निर्णय दो से चार माह के भीतर सुना दिए। लेकिन अपील के प्रावधानों के चलते, उच्च व उच्चतम न्यायालयों और फिर राज्यपाल व राष्ट्रपति के यहां दया याचिका दाखिल करने की सुविधा के कारण इन मामलों का वही हश्र हो रहा है, जैसा अमूमन सामान्य प्रकरण में होता है।

शायद इसी परिप्रेक्ष्य में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा था कि ‘जो व्यक्ति जघन्य दुष्कृत्य कर सकता है, उसका उम्र से क्या लेना-देना? फास्ट ट्रैक के बाद भी अपील पर अपील की इतनी लंबी प्रक्रिया है कि मामले के निराकरण की उम्मीद समाप्त जैसी हो जाती है। क्या ऐसे लोगों पर दया करनी चाहिए? अदालत से सजा मिलने के बाद राज्य सरकार, केंद्रीय गृह मंत्रालय और फिर राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने की सुविधा क्यों है?‘ नायडू ने यह सवाल उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर बैठे हुए उठाया था।

इसके बाद हैदराबाद की पशु चिकित्सक से दुष्कर्म व हत्या के आरोपियों को कथित मुठभेड़ में मार गिराए जाने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को कहना पड़ा था कि ‘पाॅक्सो कानून के तहत दुष्कर्म के दोषियों को दया याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। संसद को दया याचिका के प्रावधान पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।‘ लिहाजा संसद का दायित्व बनता है कि वह इस प्रश्न पर विधेयक लाए और विचार-विमर्श के बाद दया याचिका की सुविधा का रोड़ा खत्म करे। इस सुविधा का सबसे ज्यादा लाभ फांसी की सजा पाए आतंकवादी और बलात्कारी उठा रहे हैं।

दरअसल जघन्य से जघन्यतम अपराधों में त्वरित न्याय की तो जरूरत है ही, दया याचिका पर जल्द से जल्द निर्णय लेने की जरूरत भी है। शीर्ष न्यायालय ने यह तो कहा है कि दया याचिका पर तुरंत फैसला हो, लेकिन राष्ट्रपति व राज्यपाल के लिए क्या समय सीमा होनी चाहिए, यह सुनिश्चित नहीं किया। क्योंकि अक्सर राष्ट्रपति दया याचिकाओं पर निर्णय या तो टालते हैं या फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलते हैं। हालांकि महामहिम प्रणब मुखर्जी इस दृष्टि से अपवाद रहे हैं।

राष्ट्रपति बनने के बाद अफजल गुरू और अजमल कसाब की दया याचिकाएं उन्होंने ही खारिज करते हुए, इन देशद्रोहियों को फांसी के फंदे पर लटकाने का रास्ता साफ किया था। जबकि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने या तो दया याचिकाएं टालीं या मौत की सजा को उम्रकैद में बदला। यहां तक कि उन्होंने महिला होने के बावजूद बलात्कार जैसे दुष्कर्म में फांसी पाए पांच आरोपियों की सजा आजीवन कारावास में बदली।

किसी भी देश के उदारवादी लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था आंख के बदले आंख या हाथ के बदले हाथ जैसी प्रतिशोधात्मक मानसिकता से नहीं चलाई जा सकती। लेकिन जिन देशों में मृत्युदंड का प्रावधान है, वहां यह मुद्दा हमेशा ही विवादित रहता है कि आखिर मृत्युदंड सुनने का तार्किक आधार क्या हो? इसीलिए भारतीय न्याय व्यवस्था में लचीला रुख अपनाते हुए गंभीर अपराधों में उम्रकैद एक नियम और मृत्युदंड अपवाद है।

इसीलिए देश की शीर्षस्थ अदालतें इस सिद्धांत को महत्व देती हैं कि अपराध की स्थिति किस मानसिक परिस्थिति में उत्पन्न हुई? अपराधी की सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों व मजबूरियों का भी ख्याल रखा जाता है। क्योंकि एक सामान्य नागरिक सामाजिक संबंधों की जिम्मेदारियों से भी जुड़ा होता है। ऐसे में जब वह अपनी बहन, बेटी या पत्नी को बलात्कार जैसे दुष्कर्म का शिकार होते देखता है तो आवेश में आकर हत्या तक कर डालता है। भूख, गरीबी और कर्ज की असहाय पीड़ा भोग रहे व्यक्ति भी अपने परिजनों को इस जलालत की जिंदगी से मुक्ति का उपाय हत्या में तलाशने को विवश हो जाते हैं। जाहिर है, ऐसे मजबूरों को मौत की सजा के बजाय सुधार और पुनर्वास के अवसर मिलने चाहिए क्योंकि जटिल होते जा रहे समय में दंड के प्रावधानों को तात्कालिक परिस्थिति और दोषी की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर भी आंकना जरूरी है। परंतु बलात्कार और फिर महिला की हत्या भिन्न प्रकृति के अपराध हैं।

दया याचिका पर सुनवाई के लिए यह मांग हमारे यहां उठ रही है कि इसकी सुनवाई का अधिकार अकेले राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में न हो? इस बाबत एक बहुसदस्यीय जूरी का गठन हो। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता और कुछ अन्य विशेषाधिकार संपन्न लोग भी शमिल हों? यदि इस जूरी में भी सहमति न बने तो इसे दोबारा शीर्ष अदालत के पास प्रेसिडेंशियल रेंफरेंस के लिए भेज देना चाहिए।

इससे गलती की गुंजाइश न्यूनतम हो सकती है। इसके उलट एक विचार यह भी है कि राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने का प्रावधान खत्म करके सुप्रीम्र कोर्ट के फैसले को ही अंतिम फैसला माना जाए? यह विचार ज्यादा तार्किक है क्योंकि न्यायालय अपराध की प्रकृति, अपराधी की प्रवृति और परिस्थिति के विश्लेषण के तर्कों से सीधे रूबरू होती है। फरियादी का पक्ष भी अदालत के समक्ष रखा जाता है। जबकि राष्ट्रपति के पास दया याचिका पर विचार का एकांगी पहलू होता है। जाहिर है न्यायालय के पास अपराध और उससे जुड़े दंड को देखने के कहीं ज्यादा साक्ष्यजन्य पहलू होते हैं। लिहाजा तर्कसंगत उदारता अदालत ठीक से बरत सकती है?

प्रमोद भार्गव