एक बार गाय को ध्यान से देखिए तो सही !

प्रकृति के सृजन आकर्षित करते हैं। पूरी प्रकृति दिव्य है। इसका सौन्दर्य अप्रतिम है। इनमें मनुष्य सर्वाधिक जटिल प्राणी है। वह सोचता है। प्रश्न करता है। प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए खोजबीन भी करता है। मनुष्य बौद्धिक है। भावुक भी है। चार्ल्स डारविन का जन्म (1809) इंग्लैण्ड में हुआ था। दुनिया के सबसे बड़े प्रकृति शास्त्री डारविन ने प्रकृति के अध्ययन में बड़ा श्रम किया। वह इसी के लिए कई साल समुद्री यात्रा में रहा। उसने जीवों के विकास पर गहन शोध किया और एक महान ग्रंथ लिखा ”ओरिजन आफ स्पेशीज बाई मीन्ज आफ नेचुरल सेलक्शन्स“।

डारविन ने बताया है कि प्रकृति के रूप मनुष्यों में संवेदना जगाते हैं। जीवों पर परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। उनकी जीवनशैली व जीने की इच्छा प्रभावित होती है। प्रकृति विज्ञानी डारविन का शोध लगभग 200 बरस पहले का है। भारत के ऋग्वैदिकाल के कवि-ऋषि हजारों बरस पहले प्रकृति के रूपों से प्राप्त संवेदनाओं को अपने मंत्रों व कविताओं में ढाल चुके थे। ऋग्वेद में वनस्पतियों, कीट पतंगों के प्रति प्रीतिपूर्ण भावप्रवणता है। ऋग्वेद में मेढ़क पर भी काव्य सूक्त है। पक्षी के सौन्दर्य और बोली पर सुरम्य मंत्र है। रेंगने वाले कीट व सर्प भी सुंदर बताए गए हैं लेकिन गौएं सर्वाधिक प्रभावित करती हैं।

वैदिक समाज प्रकृति प्रेमी है। वह सूर्य को नमस्कार करता है। उनसे बुद्धि मांगता है। वह जल को नमस्कार करता है। उसे जीवन का आधार बताता है। पशु-पक्षी के प्रति संवेदनशील है। कुत्तों की भी प्रशंसा है। सभी जीव प्रिय है लेकिन गाय की बात ही दूसरी है। ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक गायों की प्रशंसा है। महाकाव्य और पुराण गोयश से भरे पूरे हैं। वेदों में गाय को अबध्य बताया गया है। भारत का प्राचीन साहित्य गाय-दर्शन से ओत-प्रोत है। गाय के प्रति भारतीय प्रेम का पक्ष लेने वाले विद्वानों ने तमाम तर्कसंगत बातें लिखी हैं। गाय के आर्थिक महत्व पर बहुत कुछ लिखा गया है।

गाय दूध देती है, गोबर देती है। मर जाने पर उसका शरीर भी कई कामों में प्रयुक्त होता है। वह बछड़े देती है। बैल भारतीय कृषियंत्र की धुरी थे। ट्रैक्टर जैसे तमाम यंत्रों के विकास के बाद बैल अनुपयोगी हो गए। उनको काटकर मांस का व्यापार होने लगा। यह व्यपार वैध और अवैध रूप में बहुत फैला। अवैध ज्यादा और वैध कम। गोसंवर्द्धन के पक्षकार लम्बे समय से इसके विरोध में हैं। भारतीय संस्कृति में गोसंरक्षण की महत्ता है। इसलिए संस्कृति विरोधियों ने चुनौती देते हुए गोमांस की दावतें दीं। गोवंश मारे गए। संस्कृति प्रेमी स्वाभाविक ही चिढ़े। चिढ़ाना और चुनौती देना ही संस्कृति विरोधियों का लक्ष्य था।

वैदिक काल में जनतंत्री संस्थाएं थीं। ऋग्वेद के कई मंत्रों में सभा व समिति का उल्लेख है। तब सभा में प्रमुख विषयों पर चर्चा होती थी। अब भी लोकसभा व विधानसभाओं में प्रमुख विषयों पर चर्चा होती है। वैदिक काल की सभा में गोसंरक्षण पर बहुधा चर्चा होती थी। एक मंत्र में गायों से ही संवाद है कि ”गौओं सभा में आपकी चर्चा होती है“। गोपालन प्रतिष्ठा का काम था। भारत का संविधान (1947-1950) में बना।

संविधान सभा में गाय की खासी चर्चा हुई। गोसंरक्षण और गोसंवर्द्धन के विषय को राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में सम्मिलित किया गया। गोसंरक्षण संविधान (अनुच्छेद 48) का भाग है। उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्यों में गोबध पर कानूनी रोक है। गोसंवर्द्धन के पक्षकार आन्दोलन लगातार करते हैं। गोहत्या की घटनाओं पर प्रतिक्रिया में भी आते हैं। प्रतिक्रिया स्वाभाविक भी है। अपवाद स्वरूप यह प्रतिक्रिया विधिव्यवस्था का अतिक्रमण करती है। ऐसा उचित नहीं है। गोमांस के प्रेमियों को हिन्दू भावनाओं का आदर करना चाहिए। किसी भी अल्पसमूह को बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का अपमान करने की छूट नहीं दी जा सकती।

क्या गाय को ध्यान से आपने देखा है ? ध्यान से ही देखने पर मेरा जोर है-क्या आपने गायों की आंखों को भी ध्यान से देखा है ? क्या आपने इन आंखों में करूणा का महासागर अनुभूत पाया है ? गाय का दूध आप सबने पिया ही होगा लेकिन क्या गाय का सौन्दर्यरस आपने पिया है ? वे हम सबको देखते हुए क्या असीम प्यार नही उड़ेलती है ? वे ट्रक में लदी हमारी ओर बेबसी से देखती क्या कहना चाहती है ? क्या वे हम सबसे अपना जीवन पूरा कर लेने की दया याचिका पर विचार का आग्रह करती नही प्रतीत होती ?

वे अपनी संतान के साथ कैसी लगती है। बछड़े को चाटते हुए कैसी लगती है। संस्कृत विद्वानों ने बछड़े का नाम ’वत्स’ रखा था। भगवान भक्तों के लिए हम भक्तवत्सल शब्द का प्रयोग करते हैं। पुराणों में वरिष्ठों द्वारा पुत्र को भी वत्स कहा गया है। हरेक पिता-माता के लिए उसकी संतान वत्स है लेकिन हम गोवत्सो को छुट्टा क्यों छोड़ देते हैं। जीवन उपयोगितावाद से ही नहीं चलता। प्रीति, प्रेम, सहज संवेदन सौन्दर्यबोध और भाव प्रवणता भी जीवन के मुख्य घटक हैं।

                                                                                               हृदयनारायण दीक्षित