जड़ और चेतन की दशा-दिशा तय करती है मकर संक्रांति

मकर संक्रांति सामान्य पर्व नही है। यह पर्व मेल-मिलाप का है। यह जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय करने वाला पर्व है। यह पर्व तप-तितीक्षा का है। त्याग और दान का है। धर्म और कर्म का है। यह पर्व अनेकता में एकता का है। यह सूर्य संस्कृति का पर्व है। भगवान सूर्य रघुकुल के पूर्वज थे। भगवान राम सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। रघुकुल में भगवान सूर्य की नियमित पूजा होती थी। मकर संक्रांति ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आदिशक्ति और सूर्य की आराधना-उपासना का पावन पर्व है। यह पर्व शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। राजा भगीरथ राम के पूर्वज थे। सूर्य वंश में पैदा हुए थे।

साठ हजार सगर पुत्रों, जो उनके पूर्वज थे, के उद्धार के लिए उन्होंने कठोर तप-साधना की। उनकी तप-साधना के प्रभाव से ही मां गंगा स्वर्गलोक से धरती पर आईं। कपिल मुनि के आश्रम में राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को जिस क्षण गंगा पहुंची, संयोग से उस दिन मकर संक्रांति थी। गंगा के पावन जल का संस्पर्श पाकर सगर के साठ हजार पुत्रों को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। उस समय राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों का उसी स्थान पर गंगाजल, अक्षत और तिल से श्राद्ध-तर्पण किया था। तब से माघ की मकर संक्रांति को स्नान, दान, स्नान और श्राद्ध-तर्पण की प्रथा आज तक चली आ रही है। 

कपिल मुनि ने मां गंगा को आशीर्वाद दिया था कि वे त्रिकाल तक जन-जन का पापहरण और भक्तजनों की सात पीढ़ियों को मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करेंगी। गंगाजल का स्पर्श, पान, स्नान और दर्शन सभी पुण्यदायक फल प्रदान करेगा। कपिल मुनि के उक्त वरदान में लोगों की आज भी आस्था है। मकर संक्रांति में सूर्य उत्तरायण हो जाता है। सूर्य के उत्तरायण होने पर देवताओं की ब्रह्ममुहूर्त की उपासना का पुण्यकाल आरंभ होता है। यह वह समय है, जिसमें भक्तों को परा-अपरा विद्या की प्राप्ति होती है।

यह सिद्धिकाल भी है। इस काल में देव प्रतिष्ठा, गृह-निर्माण, यज्ञ-कर्म आदि किए जाते हैं। मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व से ही व्रत-उपवास कर योग्य पात्र को दान करने का विधान है। इस बार की मकर संक्रांति इसलिए भी खास है कि इस मकर संक्रांति पर प्रयागराज में दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समारोह कुंभ आयोजित हो रहा है। इस पर्व की खासियत है कि इस कुंभ में देव, दनुज, गंधर्व, किन्नर, नाग सभी वेश बदलकर आते हैं और श्रद्धालुओं को उनकी भक्ति और श्रद्धा के अनुरूप आशीर्वाद देते हैं। 

यूं तो भगवान सूर्य की एक हजार किरणों के अपने अलग-अलग प्रभाव हैं। हर किरण उपयोगी है लेकिन सूर्य की पहली और सातवीं किरण का खास महत्व है। सूर्य की पहली किरण आसुरी सम्पत्ति मूलक भौतिक उन्नति की विधायक है, जबकि सातवीं किरण भारत वर्ष में आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरक है। सातवीं किरण का प्रभाव भारत वर्ष में गंगा-यमुना के मध्य अधिक समय तक रहता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ही हरिद्वार और प्रयाग में माघ मेला का आयोजन होता है।

मकर संक्रांति या पूर्ण कुंभ तथा अर्द्धकुंभ का विशेष उत्सव होता है। मकर संक्रांति व्रत के प्रभाव से जहां प्राणियों की आत्मा शुद्ध होती है, वहीं उसकी संकल्प शक्ति बढ़ती है। ज्ञान तंतु विकसित होते हैं। हृदय में ईश्वर के प्रति भक्तिभाव विकसित होता है। मकर संक्रांति दरअसल आत्म चेतना और भाव चेतना का विकास पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है, जो पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। 

विष्णु धर्मसूत्र में कहा गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए तथा अपने स्वास्थ्यवर्द्धन तथा सर्वकल्याण के लिए तिल के छह प्रयोग बेहद पुण्यदायी और फलदायी हैं। तिल के जल से स्नान, तिल दान, तिल का भोजन, तिल के जल का अर्पण, तिल की आहुति और तिल से उबटन-मर्दन। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर ढलता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं।

मकर संक्रांति दरअसल खगोलीय स्थिति है, जो जड़ और चेतन की दशा व दिशा तय करती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। इस राशि परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं। यह अकेला पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम हर प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह पर्व बेहद अहम है।

मकर संक्रांति को दक्षिण भारत में पोंगल, गुजरात और राजस्थान में उत्तरायण, हरियाण और पंजाब में मकर संक्रांति को माघी और यूपी बिहार में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। गुजरात में मकर संक्रांति पर खास पतंग प्रतियोगिता आयोजित होती है। नेपाल में अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नाम से मकर संक्रांति मनाई जाती है। किसान इस दिन अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देते हैं और उनकी कृपा अनवरत बनाए रखने की कामना करते हैं।

यही वजह है कि मकर संक्रान्ति को फसलों एवं किसानों का त्यौहार भी कहा जाता है। नेपाल में मकर संक्रान्ति को माघे-संक्रान्ति, सूर्योत्तरायण और थारू समुदाय में माघी कहा जाता है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख पर्व है। नेपाली तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल खाकर इस पर्व को माते हैं। नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में स्नान करते हैं। 

उत्तर प्रदेश में यह मुख्यतः दान पर्व है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर हर साल इलाहाबाद में 14 जनवरी से एक माह तक माघ मेला लगता है। माघ मेले का पहला स्नान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि के आखिरी स्नान तक चलता है। बागेश्वर में बड़ा मेला होता है। वैसे गंगा-स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं।

इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े-बड़े मेले लगते हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने की समृद्ध परंपरा है। बिहार में भी मकर संक्रान्ति को खिचड़ी कहा जाता हैं। उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान दिया जाता है।

महाराष्ट्र में इस दिन विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है। लोग एक-दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं तिल गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो। महिलाएं मकर संक्रांति के दिन परस्पर तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं। बंगाल में गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। गंगासागर में साल में एक बार मकर संक्रांति पर स्नान-दान के लिये लाखों लोगों की भीड़ होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। कहा जाता है कि सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार। तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं।

प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे दिन कन्या-पोंगल। पहले दिन कूड़ा-करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवेद्य चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं।

इस दिन बेटी और जमाई राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है। मतलब यह पर्व जितना पर्यावरण से जुड़ा है, उतना ही बालिकाओं के सम्मान से भी। असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में इस पर्व पर सुहागनें अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। मकर संक्रान्ति पर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति विविध रूपों में दिखती है।

                                                                                                                                                                                                                                    सियाराम पांडेय