अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के हालात

नई दिल्ली: ईरानी मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के हालात बन गए हैं। ईरान ने अमेरिका से सुलेमानी की हत्या का बदला लेने की घोषणा कर रखी है। उसका कहना है कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अमेरिका ने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया है। इस बीच ईरान की एक संस्था ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का सिर कलम करने पर 80 मिलियन डॉलर (करीब 5.76 अरब रुपये) इनाम की घोषणा की है।

उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चुप होकर बैठ जाने को कहा है। उनका कहना है कि सुलेमानी आतंकी था। इसीलिए मारा गया। अगर ईरान अमेरिकी नागरिकों अथवा अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले की कोशिश करता है तो माकूल जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया में सबसे ताकतवर है। हमारे पास एक से एक अच्छे और आधुनिक हथियार हैं। हम उनका उपयोग करने से तनिक नहीं हिचकेंगे।

सवाल यह कि तांडव मचता है, तो यह कितना भयावह होगा? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यह तांडव कितना लंबा खिंचेगा। खाड़ी में पहले भी अमेरिका और इराक के बीच एक लंबे युद्ध का तांडव चला है। भारत को उस तांडव का खासा अनुभव है। अब चूंकि अमेरिका और ईरान, दोनों आमने-सामने हैं। भारत ने कालांतर में दोनों से ही सामरिक और व्यापारिक स्तर पर बेहतर संबंध स्थापित किए हैं। इसलिए कसौटी पर खरे उतरने की और ज्यादा चुनौती है।

यह इसलिए कि इस बार भारत के पास 'हां' अथवा 'न' में ज्यादा विकल्प नहीं होंगे। इस तनाव से भारत सरकार की चिंताएं खाड़ी में भारतीय समुदाय की सुरक्षा के साथ-साथ कच्चे तेल और गैस की आवक को लेकर होगी। निश्चित तौर पर भारत सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए होंगे। कच्चा तेल भारत की लाइफ लाइन है। भारत की कुल खपत का 80 प्रतिशत कच्चा तेल ईरान के स्ट्रेट आफ होर्मुज के रास्ते से भारत पहुंचता है। इस मार्ग से भारत ही नहीं, एशियाई देशों जापान, कोरिया, फिलीपींस और चीन को भी कच्चे तेल की आपूर्ति की जाती है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का भारतीय अर्थव्यवस्था पर फर्क पड़ना निश्चित है।

मौजूदा स्थिति यह है कि ईरान अभी मंगलवार तक अपने मिलिट्री हीरो कासिम सुलेमानी की मृत्यु पर गहरे सदमे में है। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर आयातुल्ला खमेनी ने जिस तरह आंखे तरेरते हुए अमेरिका के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का एलान किया है, उसे देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि यह लड़ाई अब होकर रहेगी। ईरान के दबाव में इराकी संसद ने इस्लामिक स्टेट से मुकाबले के लिए अमेरिका से बुलाए पांच हजार अमेरिकी सैनिकों को देश निकाले का प्रस्ताव पारित कर दिया है। इस पर ट्रम्प ने इराक के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने की घोषणा की है।

खाड़ी देशों में करीब 85 लाख भारतीय रहते हैं, जो रोजी-रोटी कमाने गए हैं। इस खाड़ी क्षेत्र से भारत नियमित कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति करता ही है, भारत में यहां से निवेश भी होता है। भारत और ईरान के बीच प्राचीन संबंधों के कारण भारत के बहुसंख्यक शियाओं का भी झुकाव खाड़ी देशों, खासतौर पर ईरान के साथ रहा है। फिर अफगानिस्तान से रिश्ते कायम रखने, पाकिस्तान की ओर से वाघा-अट्टारी सीमा से माल की आवाजाही में रोक-टोक के बाद सेंट्रल एशिया में व्यापारिक रिश्ते बढ़ाए जाने की गरज से भारत और ईरान के बीच रिश्ते और बढ़ते गए।

इसमें चाबहार बंदरगाह एक माध्यम बना। हालांकि इस बंदरगाह के लिए भी ईरान ने समय-समय पर दिक्कतें खड़ी की। लेकिन अफगानिस्तान में खाद्य सामग्री की आवाजाही, सेंट्रल एशियाई देशों में कारोबार के लिए नए द्वार खोलने में भारत ने एक बार कदम बढ़ाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।वाशिंगटन ने इसी मनोभावना को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों ‘टू प्लस टू’ मंत्री स्तरीय वार्ता में चाबहार बंदरगाह परियोजना के मानवीय पक्ष को महत्व दिया।

नई दिल्ली के आग्रह पर वाशिंगटन ने युद्धरत अफगानिस्तान की खाद्य और जीवन यापन के सामानों की आपूर्ति और सेंट्रल एशिया में व्यापार को ध्यान में रखते हुए ईरान के दक्षिण पूर्व में चाबहार बंदरगाह को विशेष छूट से नवाजते हुए उसे पूरी तरह विकसित किए जाने पर अपनी स्वीकृति दी। पिछले सप्ताह भारत, अफगानिस्तान और ईरान के राजनयिकों ने पिछले एक वर्ष के लेखा-जोखा (4500 कंटेनर की आवाजाही ) के प्रति संतोष ज़ताया था तो अगले साल की संभावनाओं में सेंट्रल एशिया से कारोबार बढ़ाए जाने पर विचार किया था।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने टू प्लस टू वार्ता के आधार पर ईरानी विदेश मंत्री जावेद जरीफ से भी बातचीत की थी। अमेरिका ने भी चाबहार बंदरगाह के लिए अपेक्षित 85 मिलियन डॉलर के फंड में सहयोग का लिखित आश्वासन दिया था। यह बंदरगाह ओमान सागर के दूसरी ओर ईरान के दक्षिण पूर्व में बना है। अमेरिका इस बात से परिचित है कि चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान के लिए लाइफ लाइन है। अफगानिस्तान से अमेरिका अपनी सेनाएं हटाता है, तो उसे इस बात का अहसास रहेगा कि भारत इस मार्ग से अफगानिस्तान का मददगार होगा। यह अहसास भारत को भी है।

ट्रम्प के सत्तारूढ़ होने पर अमेरिका और शिया बहुल ईरान के बीच दूरियां बढ़ी हैं तो उसके सुन्नी बहुल सऊदी अरब से मधुर संबंध हुए हैं। अमेरिका के मध्यपूर्व के देशों में इजराइल के प्रति झुकाव के बावजूद भारत ने इजराइल से सामरिक संबंध तो बनाए, लेकिन फिलीस्तीन से संबंध विच्छेद नहीं किए। यही नहीं, इजराइल के धुर विरोधी ईरान के साथ ऊर्जा संबंधों को नई ऊंचाई तक लेकर गए हैं। सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, जॉर्डन, कुवैत और बहरीन की एकजुटता के बावजूद भारत के कतर और ईरान के साथ संबंधों में कमी नहीं आई।

भारत के 24 लाख लोग कतर में हैं जो वहां के निर्माण कार्यों और व्यापारिक कामों में एक स्तंभ के रूप में कार्यरत हैं। भारत ने ईरान में डेढ़ लाख कुर्द्स फोर्स के सर्वशक्तिशाली कमांडर सुलेमानी की हत्या पर बचकर वक्तव्य दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस घटना को जिस सहजता से लिया है और अमेरिका की निंदा करने से बचा है, वह एक सराहनीय कदम है। भारत ने अमेरिका और ईरान से संयम बरतने का आग्रह किया है। ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका ने भारतीय वायुसेना के विमानों का लाइन ऑफ कंट्रोल को पार करने अथवा संविधान के अनुछेद-370 को हटाए जाने के मामले को भारत का आंतरिक मामला बताते हुए भारत की निंदा करने से अपने को दूर रखा है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन दोनों मामलों में अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का साथ दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा संकट क्या मोड़ लेता है, इसकी कल्पना करना इतना सहज नहीं है। लेकिन ईरान अपनी क्षमताओं के अनुरूप साइबर हमलों से अमेरिकी बिज़नेस के लिए एक चुनौती बन सकता है। नाटो देशों का रूख अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन ईरान ने आणविक संधि से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है। संभव है, नाटो देशों में अमेरिका का कोई साथ देता है तो ईरान अपनी छोटी दूरी की मिसाइलों का उपयोग कर सकता है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुतेरस के अलावा भारत, रूस, चीन, यूरोपीय यूनियन, फ्रांस, जर्मनी सहित एक दर्जन देशों ने अमेरिका और ईरान से संयम बरतने का आग्रह किया है।