जल संकट से जूझता अपना देश

कहा जाता है कि जल है तो कल है। इस समय हमारा देश जल संकट से जूझ रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु को केंद्र सरकार की तरफ से एडवाइजरी जारी की गई है और पानी का सही इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। इससे पहले कि स्थिति भयावह हो जाए हमें सचेत हो जाना चाहिए। इसके कारणों की पड़ताल करनी चाहिए और निदान के उपाय किये जाने चाहिए। सिर्फ सरकार के भरोसे रहना और हाथ पर हाथ धरे बैठना इस समस्या का निदान नहीं है। 

संस्कृत में जल को वरुण देव की संज्ञा दी गई है। नदी के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे पूर्वजों ने नदियों की पूजा देवियों की तरह की। बारिश के मौसम में नदियां पानी से पूरी तरह भर जाती हैं और देश के 135 करोड़ लोगों को जीवन देती है लेकिन अब मुश्किल यह है कि पूरे देश में बारिश के पानी का संग्रह कोई नहीं करता। यह पानी नदियों के रास्ते बहकर समुद्र में मिल जाता है।


हमारे इतिहास में बार बार उन राजाओं और महाराजाओं की तारीफ की गई है जिन्होंने कुआं और तालाब बनवाए लेकिन आज की चकाचौंध वाले आधुनिक युग में लोगों को तालाब का महत्व पता ही नहीं है। तालाब तो अब सरकारी फाइलों में ही दिखते हैं। अब तो देश भर में तालाबों को मिट्टी से पाटकर ऊंची-ऊंची इमारतें बनाई जाती हैं जिससे भारत में भूमिगत जलस्तर लगातार घटता जा रहा है। गैर योजनागत तरीके से बस रहे शहरों में ग्राउंड वाटर को रिचार्ज किए जाने का काम नहीं हो रहा है जिससे भविष्य में जल संकट की आशंका दिखाई दे रही है।

एक मीडिया रिपोर्ट की मानें तो भारत में रोज 4000 करोड़ लीटर पानी बर्बाद हो रहा है। देश में छह करोड़ 30 लाख लोगों को पीने का साफ पानी भी नहीं मिल पाता है। 23 फीसदी  लोगों को दिनभर में 40 लीटर पानी मिलना भी मुश्किल है। जिनके घरों में पानी आसानी से मिल जाता है, वह 40 फीसदी तक पानी फालतू में बहा रहे हैं या लीकेज से बर्बाद होने दे रहे हैं। घरों में पानी के इस्तेमाल की बात करें तो टूथ ब्रश करते समय नल खुला रखते हैं तो प्रति व्यक्ति एक बार में 4 से 5 लीटर पानी बहा देता है। यानी 1 महीने में प्रति व्यक्ति 150 लीटर पानी तो टूथ ब्रश करने में ही बहा देता है। शावर से नहाने पर एक व्यक्ति 75 लीटर तक पानी खर्च कर देता है। शावर की जगह बाल्टी से नहाया जाए तो 80 फीसदी तक पानी बचा सकते हैं।

कार को अगर बाल्टी में पानी लेकर साफ करें तो महज 20 लीटर पानी ही लगता है वहीं पाइप से कार धोने में एक बार में 150 लीटर पानी की बर्बादी होती है। महानगरों में पाइप लाइन के वाल्ब की खराबी से प्रतिदिन 17 से 44 फीसदी पानी बेकार बह जाता है। भारत में 10  मेट्रो सिटी ’डे जीरो’ की तरफ बढ़ रहे हैं।  ’डे जीरो’ का मतलब है  वह वक्त जब शहरों में नलों से पानी आना बंद हो जाएगा।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा प्रकाशित पत्रिका डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की राजधानी दिल्ली और साइबर सिटी बेंगलुरु समेत 28 शहर भीषण जल संकट की मार झेल रहे हैं। दुनियाभर के 200 शहर ’डे जीरो’ की ओर बढ़ रहे हैं। वर्ष 2050 तक 36 फ़ीसदी शहर पानी की गंभीर समस्या से जूझेंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीकी शहर केपटाउन की तरह ही दक्षिण भारत के बेंगलुरु शहर में भी तेजी से जलस्तर घट रहा है। कुछ ही सालों में यहां पानी की भयंकर समस्या पैदा हो सकती है। यही हाल चेन्नई का भी है। जरूरी सवाल यह है कि क्या यह शहर एक नया और सुरक्षित भविष्य बना पाएंगे जहां पानी की समस्या न हो। जबकि पानी बचाने में सरकारें व आम आदमी दोनों ही काफी सुस्त हैं।

सवाल यह है कि जल संकट का इतना बड़ा मुद्दा पूरे चुनाव से गायब रहा। जल संकट हमारे देश में राजनीतिक मुद्दा कब बनेगा? सरकारी व राजनेता इस जल संकट को गंभीरता से कब लेंगे? लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अमित शाह जैसे नेताओं ने खूब चुनावी रैलियां की लेकिन पानी बचाने के लिए या पानी की बर्बादी रोकने के लिए या भविष्य में जल संकट से देश को उबारने के लिए कोई बातें या कोई संदेश जनता के सामने किसी ने नहीं रखा। पूरा चुनाव ’बालाकोट एयर स्ट्राइक,’ ’जय श्री राम’, ’चौकीदार चोर है’ के नारों में ही बीत गया। जल संकट से जूझ रहे राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां भी इस गंभीर समस्या को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाती हैं।

पानी को बचाने के लिए सभी को जागरूक होना पड़ेगा। सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं को मजबूत इच्छा शक्ति के साथ लगना होगा और आम आदमी को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी। सरकारी पाइपलाइन  से पानी की बर्बादी रोकने के लिए जवाबदेही तय करनी पड़ेगी। पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून भी बनाने पड़ेंगे। राहत की बात यह है कि गुजरात के बड़ोदरा से 160 किलोमीटर दूर स्थित दाहोद में जल संकट को देखते हुए नगर निकाय ने पानी बर्बाद करने पर जुर्माना लगाने का फैसला किया है लेकिन ऐसे फैसले वहां पर  पहले आवश्यक हैं जहां पर अभी जल संकट नहीं है। समय रहते पानी की बर्बादी रोकने के  समुचित उपाय कर लिए जाएं ताकि शहरों का भविष्य सुरक्षित रह सके।


                                                                                                   अमित शंकर