कोरोना संकटः कहां हैं भारत के कॉरपोरेट घराने?

भारत कोरोना की खतरनाक त्रासदी के मुहाने पर है। पूरा देश लॉकडाउन स्थिति में है तब सवाल यह है कि भारत के धनी-मानी लोग कहां हैं? क्या भारत में कॉरपोरेट घरानों की मानवीय जवाबदेही निर्वहन का यह सबसे निर्णायक समय नहीं है? सरकार के स्तर पर कोरोना संकट से लड़ने के अवसर समावेशी नहीं हो सकते हैं। क्योंकि सब कुछ न तो सरकारी नियंत्रण में है न ही राज्य की ऐसी क्षमता। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर नागरिकों, कर्मचारियों, पीड़ितों और सामान्य जन के लिए रियायतों, उपचार और वैकल्पिक व्यवस्था का एलान किया है।

भारत के ज्यादातर औद्योगिक घरानों की तरफ से इस लॉकडाउन स्टेज तक कोई बड़ी मदद राष्ट्र के लिए घोषित नहीं हुई है। उल्टे कालाबाजारी, जमाखोरी की हरकतें हमारे राष्ट्रीय चरित्र को शर्मसार कर रही हैं। भारत में परोपकार की समृद्ध परम्परा रही है। हजारों साल से समाज के धनी-मानी लोग न केवल कोरोना जैसी परिस्थितियों बल्कि सामान्य हालातों में भी पीड़ित, गरीब, मजलूम की सहायता परोपकारी भावना से अनुप्राणित होकर करते रहे हैं। "परहित सरस् धर्म नहीं"-जैसे जीवन सन्देश हमारा दिग्दर्शन करते रहे हैं। लेकिन मौजूदा कोरोना संकट में हमारे उद्योगपति, करोबारी कहां हैं? यह सवाल बड़ा है। भारत सरकार और राज्यों की सरकार 31 मार्च तक लॉकडाउन अवधि में कर्मचारियों को वेतन देंगी। दिहाड़ी मजदूरों को अनाज और नकदी की व्यवस्था भी की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में सम्पन्न लोगों से बड़ी स्पष्ट अपील की थी कि वे इस संकटकाल में उदारता के साथ आम नागरिकों के साथ खड़े हों।

कम्पनी एक्ट में लाभांश का दो फीसदी सीएसआर (सामाजिक उत्तरदायित्व निधि) पर व्यय का विशिष्ट प्रावधान है। बेहतर होगा इस दायरे में आने वाले सभी कॉरपोरेट संस्थान इस मद की राशि सीधे प्रधानमंत्री राहत कोष या सीधे अपने कार्यबल से व्यय करना सुनिश्चित करें। क्योंकि ऐसे ही समय इस मद की वास्तविक उपयोगिता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी आज कॉरपोरेट का दखल व्यापक है। यूपी के अम्बेडकर नगर के एक निजी नर्सिंग होम्स संचालक डॉ. अतुल पांडे के अलावा किसी निजी अस्पताल ने अपनी तरफ से रियायत या सहयोग की घोषणा नहीं की है। कनक हॉस्पिटल और ट्रॉमा सेंटर के मालिक डॉ. पांडे की पत्नी भी विशेषज्ञ हैं और उन्होंने पूरा अस्पताल सरकार को सौंप दिया है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के देशभर में श्रृंखलाबद्ध अस्पताल हैं लेकिन अंबेडकर नगर जैसा समाचार सामने नहीं आया है।


रिलायंस, अडानी, एचसीएल, गोदरेज, पतंजलि जैसी कम्पनियों में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। बेहतर होता सभी घराने एकसाथ सभी कर्मियों के सवैतनिक अवकाश की घोषणा कर देते। हेल्थ सेक्टर की कम्पनियां मास्क और सेनिटाइजर पर मुनाफ़ा मुक्त आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती हैं इससे कालाबाजारी की स्थिति निर्मित नहीं होगी। निजी हैल्थ सेक्टर के श्रंृखलाबद्ध अस्पताल सरकारी तंत्र से बेहतर है। अच्छा हो कि महानगरों में स्थित सभी बड़े अस्पताल सरकार के लिये सुपुर्द कर दिए जाएं। वस्तुतः लॉक डाउन लंबा भी खिंच सकता है ऐसे में एसोचैम, फिक्की, चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अलावा देश के सभी व्यापारिक संगठनों को सरकार के साथ यथासंभव सहयोग की संभावना खुद निर्धारित करनी चाहिये। क्योंकि आने वाले समय में चुनौतियां और भी खतरनाक होने के आसार हैं। जीवन उपयोगी और खानपान की वस्तुओं का संकट भी खड़ा होगा क्योंकि मुनाफाखोर हर स्तर पर सक्रिय हैं। इनसे निबटने में सरकार सफल नहीं हो सकती है जबतक कि कॉरपोरेट साथ खड़े न हों।

औद्योगिक वर्ग को यह समझना होगा कि जब भारत स्वस्थ्य नहीं होगा तो उनके लिए न उत्पादन संभव है न विपणन। इसलिये यह बेहद जरूरी है कि भारत का निजी क्षेत्र सरकार के साथ समानांतर रूप से इस त्रासदी का सामना करने के लिए अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। भारत अफवाह पसन्द देश भी है, यहां झूठी और मनगढ़ंत बातें अक्सर पूरे लोकजीवन को घेर लेती है। अगर सरकार और देश के सभी औद्योगिक घराने इस समय एकजुट होकर देश की जनता के सामने खड़े हों तो भारत मनोवैज्ञानिक रूप से भी इस जंग को जीतने में सफल होगा। क्योंकि कोरोना केवल एक स्वास्थ्यगत चुनौती नहीं है, यह आर्थिक हमला भी है। इसका समेकित शमन केवल सरकार के स्तर पर संभव नहीं है। पूरी दुनिया को भारत ने परोपकार और अपरिग्रह के जीवन मूल्य दिए हैं। भारत का अतीत भी कारोबारियों के सामाजिक योगदान से चमकता हुआ है इसलिए अपेक्षा की जानी चाहिये कि इस वैश्विक महामारी के संकट में भारत के कॉरपोरेट घराने देश के साथ खड़े रहेंगे।

डॉ. अजय खेमरिया