चुनावों में हिंसक क्यों हो गया शांत बंगाल

आम तौर पर पश्चिम बंगाल देश का शांत प्रदेश माना जाता है। बंगाल की धरती ने देश को कई साहित्यकार, कलाकार दिए हैं। आजादी के लड़ाई में पश्चिम बंगाल के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। प्रख्यात कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर, लाला लाजपत राय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन सभी पश्चिम बंगाल के ही लाल रहे हैं। मजदूरों के मिजाज का शहर कोलकाता भी पश्चिम बंगाल में ही है। लेकिन तहजीबों और संस्कारों की धरती पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के दौरान जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह निश्चित रुप से भयभीत कर देने वाला है।

मतदान के दौरान जिस प्रकार की हिंसा की खबरें वहां से आ रही हैं, वह चिंताजनक हैं। चिंतनीय तथ्य यह भी है कि वहां हिंसा के शिकार केवल एक दल विशेष के कार्यकर्ता ही हो रहे हैं। इसका आशय यह भी निकाला जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में आज केवल भाजपा ही ऐसा राजनीतिक दल है जो ममता बनर्जी की पार्टी के लिए खतरनाक राजनीतिक चुनौती प्रस्तुत कर रही है। ममता बनर्जी की परेशानी यह है कि उनका केवल पश्चिम बंगाल में ही अस्तित्व है, अन्य राज्यों में नहीं। अगर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल पश्चिम बंगाल में अपेक्षाकृत प्रदर्शन नहीं कर पाती तो उसके सामने स्वाभाविक रुप से राजनीतिक प्रतिष्ठा का एक बहुत बड़ा प्रश्न भी उपस्थित हो जाएगा।

तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही अस्तित्व की लड़ाई में यह स्पष्ट है कि जहां भाजपा शून्य से शिखर की ओर जाने का मार्ग तलाश कर रही है। उधर, तृणमूल कांग्रेस लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर केन्द्रीय राजनीति में अपना मजबूत पक्ष बनाने की कवायद कर रही है। तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को यह बहुत पहले से ही लगने लगा है कि वह भी देश की प्रधानमंत्री बन सकती हैं। सच यह भी है कि ममता बनर्जी के मन में एक भय व्याप्त हो गया है कि कहीं भाजपा बाजी न मार ले जाए। संभवत: पश्चिम बंगाल में इसी बात को लेकर अपनी ताकत दिखाने का खेल चल रहा है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह भी है कि एक समय पश्चिम बंगाल की राजनीतिक धुरी रह चुकी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी उस स्थिति में नहीं हैं कि वे प्रदेश में खास कामयाबी प्राप्त कर सकें।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और भाजपा के बीच चल रहे धमाकेदार घमासान का कारण यह भी माना जा रहा है कि भाजपा अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिए बहुत कठोर दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी इन घुसपैठियों के बचाव में खड़ी हो गई हैं। भाजपा की ओर से आमसभाओं में खुलेआम कहा जा रहा है कि विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करेंगे। अगर निष्पक्ष भाव से कहा जाए तो विदेशी घुसपैठियों का बाहर करना ही देशहित में है। अगर घुसपैठिये जाएंगे तभी देश के संसाधनों का देश के नागरिक उपयोग कर पाएंगे। पता नहीं यह बात ममता के दिमाग में क्यों नहीं आ पा रही है। यह कदम देश सुरक्षा के लिए बहुत ही आवश्यक है। लोकतंत्र में राजनीतिक तनातनी होनी चाहिए, लेकिन जहां देश की सुरक्षा की बात आती है तो वहां ऐसी राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार से हिंसा का तांडव हो रहा है, उससे स्वाभाविक रुप से लोकतंत्र पर सवालिया निशान अंकित हो रहे हैं। सवाल यह भी कि पश्चिम बंगाल में केवल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है। भाजपा के उम्मीदवार भी इस हिंसा का शिकार हो रहे हैं। वास्तव में लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता। लेकिन पश्चिम बंगाल में मतदान के दौरान हो रही हिंसा ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह बात सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या बहुत ज्यादा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि इन घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक प्रकार से इन घुसपैठियों का सहयोग कर रही हैं। पश्चिम बंगाल में प्राय: यही देखा जा रहा है कि जहां भाजपा कार्यकर्ताओं की बस्ती है, वहां भय का वातावरण बनाया जा रहा है। इसका कारण यही माना जा रहा है कि भाजपा के कार्यकर्ता वोट डालने ही न जाएं। इसके कारण तृणमूल कांग्रेस का विरोधी वोट अपने घर में छिपकर बैठने का विवश होता जा रहा है। दूसरी ओर एक और तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि ममता बनर्जी को अपने राज्य की पुलिस के अलावा कोई भी सुरक्षा बल रास नहीं आ रहा है। अभी हाल ही में केन्द्रीय सुरक्षा बल पर ममता बनर्जी ने यह सवाल उठाया है कि राज्य में केन्द्रीय सुरक्षा बल की वर्दी पहन कर भाजपा कार्यकर्ता आ रहे हैं। सवाल यह कि अगर सुरक्षा बल हिंसा रोकने की कार्यवाही करते हैं तो उसको रोकने का प्रयास वाला जवान ममता बनर्जी को भाजपा का कार्यकर्ता क्यों दिखाई देता है? हिंसा रोककर सुरक्षा बल के जवान अपना कर्तव्य ही निभा रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी की सरकार उनको ही आरोपित कर रही है। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को रैली करने से प्रशासन ने मना कर दिया।

उल्लेखनीय है कि प्रशासन राज्य सरकार के अधीन ही होता है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का बहुत हद तक दुरुपयोग कर रही है। क्या इसे लोकतंत्र के लिए उचित कहा जा सकता है? कदाचित नहीं। क्या पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची है? आज पूरे देश में पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा की चर्चा हो रही है। शांत बंगाल बेवजह बदनाम हो रहा है। चर्चा यह भी है कि क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को उसी राह पर ले जाने का प्रयास कर रही हैं, जिस पर वामपंथी सरकार के समय चलता रहा था। अगर ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं है। केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को चाहिए कि पश्चिम बंगाल में हिंसा मुक्त चुनाव कराने के लिए अगर और सुरक्षा बलों की आवश्यकता लगती है तो उसकी व्यवस्था भी करना चाहिए, जिससे लोकतंत्र की रक्षा हो सके।