कोरोना से जंगः कठिन डगर का लंबा सफर

देश भर में जहाँ भी निगाहें जाती हैं हर कहीं बस एक-सी तस्वीर नजर आती है। सूनी गलियाँ, बन्द बाजार, निर्जन पार्क, ताले डले बारात घर, वीरान और बन्द पड़े ढाबे, रेस्टॉरेन्ट, स्कूल-कॉलेज, घरों में कैद लोग। सवाल बस यही कि कब तक? सरकारों ने भले ही ढील का ऐलान कर दिया हो लेकिन ज्यादातर लोग हैं कि फिर भी निकलने को तैयार नहीं! जान पर आफत कहें या जान की कीमत, सब समझने लगे हैं। एक बात तो पक्की है कि यह समझ पैदा करने का श्रेय भी सरकारी कोशिशों को ही है वरना ट्रेनों, बसों और बाजारों की भीड़ के नजारे किसने नहीं देखे। केन्द्र, राज्य और स्थानीय जिला प्रशासन के बीच पालेबाजी कहें या पब्लिक की समझ, सेहत को लेकर सभी काफी होशियार हैं।

लॉकडाउन-2 के बाद एकबार यह भी लगा कि तालाबन्दी कबतक? लेकिन पीड़ित आंकड़ों की बाढ़ और नई जगहों पर मिलते संक्रमितों ने खुद-ब-खुद ‘दो गज’ की आपसी दूरी बढ़ा ली। सोशल बनाम फिजिकल डिस्टेंसिंग कुछ भी कहें, इसी ने आपसी दूरियों पर अमल और दूसरे विकसित और विकासशील देशों के मुकाबले हुए संभावित संक्रमणों की कमी ने भारत की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा। जिस बीमारी का अभी तक कोई माकूल इलाज न हो, कोई दवा या वैक्सीन तक ईजाद न हो उसके लिए सूतक सरीखी दूरी से बेहतर भला क्या हो सकता है? चीन की सीमा से लगने वाले वियतनाम का उदाहरण दुनिया के सामने है जहाँ अबतक एक भी मौत कोरोना से नहीं हुई। जनवरी के आखिर में जैसे ही पहला मामला आया, तत्काल वियतनाम ने समझा कि बीमारी विदेशों से आ रही है। तुरंत हवाई अड्डों पर विदेश से आने वालों की थर्मल स्क्रीनिंग शुरू हुई 14 दिन के लिए सभी क्वारंटाइन में सख्ती से भेजे जाने लगे। उनके संपर्कों की जानकारी जुटाई, सभी के टेस्ट कराए तथा मार्च के आखिर में वियतनामी मूल के देशी-विदेशी और उनके परिजनों को भी आने की इजाजत रोक दी गई। कोरिया और जर्मनी जितने संसाधनों की कमी के बावजूद खुद ही सस्ती और मानकों पर खरी टेस्टिंग किट्स तैयार की। अब धीरे-धीरे प्रतिबंध हटाने के साथ स्कूलों व बाजारों को भी खोला जा रहा है। यही कारण है कि पौने दस करोड़ की आबादी वाले वियतनाम में 23 अप्रैल तक केवल 268 संक्रमित मामले सामने आए।

इस बात से इनकार नहीं कि आने वाले दिन बेहद चौकस रहने के हैं। कोरोना को लेकर अंतर्राष्ट्रीय बहसबाजी भी दिख रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एधानोम घेब्रेयसस, यूएन एजेंसी के 30 जनवरी की वैश्विक इमरजेंसी की घोषणा का अलाप कर रहे हैं। चेता रहे हैं कि वायरस का पीरियड लंबा होगा। कई देशों के लिए शुरुआती दौर बताते हैं तो जिन देशों ने काबू का दावा किया था वहाँ भी बढ़ रहे संक्रमण का डर दिखाते हैं तथा अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी देशों सहित ट्रम्प की चूक भी बताते हैं। वहीं ट्रम्प टेड्रोस एधानोम घेब्रेयसस पर चीन का पक्षधर होने का आरोप लगा इस्तीफा मांग रहे हैं।

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने अलग चेतावनी दी है कि कोरोना महामारी लंबे समय के लिए है, इसे हल्के में न लें अभी तो शुरुआत है। उन्होंने लॉकडाउन में ढील पर चली राष्ट्रव्यापी बहस तथा ज्यादा ढील के सुझावों को गलत ठहराया और कहा कि डगर कठिन है मगर निपटने की खातिर हमारी ताकत व साँस जल्द नहीं खत्म हों।अपनी राज्य सरकारों को चेतावनी भी दी कि लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियां बंद होने का दबाव झेल रहे राज्य अलग-अलग छूट देकर जंग की कामयाबी को ही दाँव पर लगा रहे हैं।

इधर डब्ल्यूएचओ लोगों को ‘जोखिम मुक्त प्रमाणपत्र’ देने के खिलाफ है। उसका मानना है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है जिससे कोविड-19 संक्रमण से मुक्त हो चुके रोगियों में प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हुई हो और वो सुरक्षित हैं तथा दोबारा उनके संक्रमित होने की संभावना नहीं है। इसके लिए अधिक रिसर्च की जरूरत है। जो ऐसा मान भी रहे हैं कि दोबारा संक्रमित होने के खिलाफ उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत हुई है वो हेल्थ एडवायजरी की अनदेखी करेंगे, जिससे संक्रमण जारी रहने का खतरा बढ़ा सकता है। जरूरत है एंटीबॉडी की जांच को और अधिक कारगर करने की ताकि वह सही और भरोसेमन्द बन सके।

विडंबना देखिए जिस भोपाल में घटी विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस कांड से लोग बच गए अब उनकी जान कोरोना नहीं बख्श रहा है। जाहिर है खतरा बड़ा है और बचाव के लिए दवा या वैक्सीन तक नहीं है। दवा के लिए भी विकसित देशों के अलावा भारत की कोशिशों की ओर पूरी दुनिया की निगाहें हैं। प्लाज्मा थेरेपी के अलावा हाल ही में सेप्सिवैक नामक नई दवा के क्लीनिकल ट्रायल को मिली मंजूरी बेहतर इशारा है, वह भी ऐसे समय में जब दुनिया का दारोगा अमेरिका के बड़बोले और मुंहफट राष्ट्रपति ट्रंप तक में खिसियाहट दिख रही है। कभी वो मीडिया से बातचीत में सेनेटाइजर के इंजेक्शन की बात करते हैं तो कभी अल्ट्रा वायलट किरणों के डोज को किसी तरह शरीर में इंजेक्ट करने की जुगत की सलाह देकर हंसी करवाते हैं। पहले भी हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन के लिए भारत पर दबाव बना मंगवा तो ली, जिसके लिए खुद उनका देश बिना रिसर्च तैयार नहीं था। अब तो खुलेआम वहाँ के डॉक्टर इसके नुकसान गिना रहे हैं और ब्राजील ने तो इस्तेमाल यह कह रोक दिया कि इस दवा से मौतें ज्यादा हो रही हैं।

इन हालातों में मास्क ही रामबाण है, जिसका न कोई इफेक्ट न कोई डिफेक्ट है और जो मुँह पर वायरस के संभावित प्रवेश को रोक देता है। इसे जैन धर्मावलंबियों ने काफी पहले ही समझ लिया था, अब तो प्रधानमंत्री मोदी भी इसका उद्धरण कर सभ्य समाज की निशानी मानते हैं। मन की बात में प्रधानमंत्री द्वारा उद्धृत संस्कृत सुभाषितानी के एक श्लोक है जिसके मायने काफी गहरे हैं- “अग्नि: शेषं ॠण: शेषं शत्रु शेषं तथैव च। पुन: पुन: प्रवार्धेत तस्मात् शेषं न कारयेत।।” यानी अग्नि, ऋण और शत्रु ये तीनों वो सत्य हैं जो शेष रह जाएँ तो बार-बार बढ़ जाते हैं। इसलिए उचित यही है कि इन तीनों को पूरी तरह समाप्त करके ही चैन से बैठना चाहिए।

निश्चित रूप से यह भारत के लिए सबसे बड़े धैर्य और परीक्षा की घड़ी है। इसमें धर्म, जात-पात की सीमाओं से इतर सभी को एक-दूसरे से दो गज की दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग बनानी ही होगी, जरूरत के हिसाब से बिना सरकारी फरमानों के इंतजार किए खुद ही घरों में लॉकडाउन रहना होगा और कोरोना वायरस की संभावित उम्र के खत्म होने का इंतजार करना ही होगा। इसी में भलाई है और यही दवाई है। यह समय बजाए सरकार की नुक्ताचीनी के सेहत की बेहतरी के लिए खुद ही सोचने का है और अपना, समाज व असहाय लोगों को आगे बढ़कर मदद पहुँचाने का है। सच है कि आर्थिक स्थितियाँ ठीक नहीं हैं लेकिन इतना भी तो नहीं है कि भूखा मरने की नौबत आए, अनाज पर्याप्त है। बस कोरोना की लड़ाई तक हम सबको खुद को समाज को जिन्दा रखना है क्योंकि वक्त बदलते देर लगती नहीं। संभव है कोरोना से युध्द के पश्चात ही भारत विश्व गुरु बन जाए।

ऋतुपर्ण दवे