लॉकडाउनः हवा और पानी की गुणवत्ता में सुधार

सड़क पर गाड़ियों की कतारें, धुआँ उगलते कारखाने और धूल बिखेरते निर्माण हमारे शहरों के विकास की पहचान बन गए हैं। बड़े पैमाने पर होने वाली ये गतिविधियां हमारे शहरों की हवा को कितना विषाक्त कर रही हैं तथा नदियों के प्रदूषण में औद्योगिक कचरे का कितना प्रभाव पड़ रहा है, यह राष्ट्रीय लॉकडाउन के अनुभवों से आँका जा सकता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नई दिल्ली के ताजा आंकड़ों के अनुसार पर्यावरण सुधार के अच्छे संकेत 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान भी देखे गये। दिल्ली में उस दिन वायु गुणवत्ता इंडेक्स (एक्यूआई) 101 से 250 के बीच था। पिछले वर्ष इसी दिन के आंकड़ों से तुलना करें तो वायु के अपेक्षाकृत बड़े प्रदूषणकारी धूल कणिकाओं पी.एम. 10 की मात्रा में 44% की कमी पायी गयी। अधिक खतरनाक माने जाने वाले सूक्ष्म वायु कणिकाएँ पी.एम. 2.5 की मात्रा में हालाँकि 8% की ही कमी अंकित की गयी, पर इसका कारण इनके नीचे आकर किसी सतह पर स्थिर होने में लगने वाला समय माना जा सकता है। सड़कों पर मोटर वाहनों की आवाजाही रुक जाने के कारण 21 मार्च की तुलना में जनता कर्फ्यू के दिन आश्चर्यजनक रूप से जहरीली गैसों नाइट्रोजन और सल्फर के ऑक्साइडों में दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में 34 और 51 प्रतिशत की कमी अंकित की गयी। हालाँकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में नोएडा और गाज़ियाबाद के आंकड़े जितने अच्छे पाए गये, गुड़गांव और फरीदाबाद के वायु प्रदूषण में उतना सुधार नहीं मिला इसलिए वायु प्रदूषण में स्थानीय कारणों की भूमिका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों से बंधे विश्व में जब अर्थशास्त्रियों और व्यापार प्रबंधकों का वर्चस्व बढ़ने लगा तो भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं के प्रकृति और इसके विभिन्न अवयवों को मां के समान सम्मान देने वाली अवधारणाओं को परे धकेल अधिक से अधिक उत्पादन और खपत को ही राष्ट्रीय एवं वैश्विक समृद्धि का सूचकांक माना जाने लगा। परन्तु दो दशकों में ही जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं, वैश्विक गर्मी की समस्याओं एवं प्रदूषण से होने वाली बीमारियों ने पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थिकीय संतुलन की अवश्यताओं की चर्चा को अनेक वैश्विक एवं राष्ट्रीय मंचों पर बहस के केंद्र में ला दिया है। पर्यावरण संरक्षण के महत्व को स्वीकारते हुए विश्व के अनेक देशों ने सतरह धारणीय विकास लक्ष्यों को अपनी विकास योजनाओं में शामिल करना शुरू कर दिया है।

हालाँकि जाड़ों की जहरीली धुंध के बाद मार्च आते-आते सूरज की रौशनी के लगातार उपलब्ध होने और हवाओं के मुक्त बहाव के कारण इन दिनों हवा की गुणवत्ता तुलनात्मक रूप से बेहतर होती है, तब भी लॉकडाउन के पहले सप्ताह के आंकड़े वायु गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार इंगित करते हैं। वायु की गुणवत्ता को समवेत रूप से शामिल मुख्य वायु प्रदूषकों की मात्रा के आधार पर वायु गुणवत्ता इंडेक्स के रूप में आँका जाता है । एक्यूआई का स्तर शून्य से पचास होने पर हवा की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है। इक्यावन से सौ एक्यूआई वाली हवा संतोषजनक, एक सौ एक से दो सौ वाली मध्यम स्तर की खराब, दो सौ एक से तीन सौ वाली खराब, तीन सौ एक से चार सौ अत्यंत खराब एवं चार सौ एक से से पांच सौ ए क्यू आई वाली हवा को खतरनाक माना जाता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 21 मार्च के 54 शहरों में अच्छी और संतोषजनक एवं 9 शहरों में खराब वायु गुणवत्ता इंडेक्स की तुलना में 29 मार्च को भारत के कुल 91 शहरों में वायु गुणवत्ता अच्छी (30 में) एवं संतोषजनक (61) पायी गयी। इस दिन किसी भी शहर की हवा खराब नहीं मिली परन्तु कानपुर, लखनऊ, मुजफरनगर, कल्याण, सिंगरौली, गुवाहाटी जैसे कई शहरों में 25-28 मार्च के आंकड़ों अनुसार स्थानीय कारणों से पी. एम. 2.5 का स्तर अवश्य खराब रहा। दिल्ली में इस वर्ष 25 मार्च से 1 अप्रैल के बीच लॉकडाउन के पहले सप्ताह में पी.एम. 2.5 मात्र 16-42 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर मापा गया जो 2019 में 72-187, 2018 में 72 से 171 तथा 2016 में 49 से 116 माइक्रोग्राम पर क्यूबिक की तुलना में काफी कम है।

अनेकों फोटोग्राफ और लोगों की धारणाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि इस लॉकडाउन के कारण दिल्ली में यमुना एवं कानपुर तथा वाराणसी में गंगा के प्रदूषण स्तर में भी महत्वपूर्ण सुधार आया है। यूँ तो नमामि गंगे परियोजना के कारण फाफामऊ के नालों सहित गंगा को लगातार प्रदूषित करने वाले दूसरे अन्य नालों को पिछले वर्ष से ही बंद कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान वाराणसी में गंगा में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा 8.3 -8.9 ग्राम प्रति लीटर पायी गयी जो स्वच्छ जल के न्यूनतम स्तर 7 ग्राम प्रति लीटर से पर्याप्त अधिक है। दिल्ली जल बोर्ड और नागरिकों का मानना है कि इस लॉकडाउन में यमुना का प्रदूषण स्तर भी पर्याप्त मात्रा में सुधरा है। भारत ने इस वैश्विक महामारी में धैर्य और सक्षम नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन कर विश्वभर में संयम एवं अनुशासन का अनूठा पाठ पढ़ाया है। भारतीय संस्कृति एवं पर्यावरण हितैषी दर्शन को विश्व के सामने प्रस्तुत कर देश के नेतृत्व को धारणीय विकास की अवधारणाओं को स्थापित करने में भी निर्णायक पहल करनी चाहिए।

राणा प्रताप सिंह