कोरोना की दवाः बाबा रामदेव के दावे पर सवाल

कोरोना संकट निश्चित रूप से विकट जानलेवा आपदा है। इसने जन-धन को भारी नुकसान पहुंचाया है। चीन की फैलाई इस बीमारी ने दुनिया के अधिसंख्य देशों में तबाही का मंजर उपस्थित कर दिया है। जिस तेजी से कोरोना संक्रमितों की तादाद बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जल्द ही यह आंकड़ा एक करोड़ के पार हो जाएगा। दुनिया भर में अबतक 93 लाख 43 हजार 220 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। इनमें से 4 लाख 78 हजार 920 लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में कोरोना पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 4,56,183 हो गई है, जिनमें से 1,83,022 सक्रिय मामले हैं। 2,58,685 लोग ठीक हो चुके हैं जबकि 14,476 लोगों की मौत हो चुकी है। सुखद संकेत यह है कि कोरोना से लोग ज्यादातर संख्या में ठीक भी हो रहे हैं लेकिन ऐसा उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के जरिये हो रहा है। जिस तरह अभी भी कोरोना के लक्षण बताए जा रहे हैं, उससे उम्मीदों के बांध का टूटना स्वाभाविक है।

कोरोना का टीका अभी वैज्ञानिक विकसित ही नहीं कर पाए हैं। इस बीच भारत में योगगुरु बाबा रामदेव ने कोरोना की अचूक दवा बनाने का दावा किया है। जब आयुर्वेद और होम्योपैथी के चिकित्सक यह जानते हुए भी कि आयुर्वेद और होम्योपैथी में कोरोना का इलाज है, उसका दावा नहीं कर पा रहे थे तब योगगुरु रामदेव पहले दिन से कोरोना के निश्चित इलाज की बात कर रहे हैं। हालांकि उनके दावे को तब भी व्यावसायिक नजरिये से देखा जा रहा था और आज भी उस स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। बिहार और राजस्थान में उनकी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद और निम्स यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष के खिलाफ दर्ज कराए गए मुकदमे कमोबेश इसी ओर इशारा करते हैं। उनपर आरोप है कि वे देश की जनता को गुमराह कर रहे हैं।

विचारणीय तो यह है कि होम्योपैथी की दवाएं जर्मनी की फार्मेसी में बनती है, उस जर्मनी द्वारा भी कभी कोरोना के इलाज का दावा नहीं किया गया। आयुर्वेद के अधिकांश डॉक्टर ऐलोपैथिक दवाएं लिखने लगे हैं। मतलब उन्हें अपनी ही पद्धति पर भरोसा कम है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बाबा रामदेव किस आधार पर कोरोना के इलाज का दावा कर रहे हैं। कोरोना को विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्तर पर महामारी घोषित किया जा चुका है। ऐसे में किसी अचूक दवा की घोषणा करने से पहले कम से कम भारत सरकार की प्रयोगशाला में उसका परीक्षण जरूरी था। विश्व स्वास्थ्य संगठन से इस बाबत अनुमति ली जानी चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन अमेरिका की कोरोना की औषधि के दावे भी ठुकरा चुका है। ऐसे में बिना उसकी अनुमति के कोई दवा कैसे बेची जा सकती है। रामदेव की दवा भले ही उपयोगी हो लेकिन उसपर बिना किसी ठोस वैज्ञानिक परीक्षण के यकीन कर लेना कोरोना पीड़ितों की जान को खतरे में डालने जैसा होगा।

उत्तराखंड आयुर्वेद विभाग की ओर से भी कहा गया है कि उन्होंने कोरोना की दवा बनाने के नाम पर नहीं, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दवा बनाने के नाम पर लाइसेंस प्राप्त किया था। वह उनसे पूछ रहा है कि कोविद -19 की दवा का किट बनाने की अनुमति उन्होंने कहाँ से ली। व्यवहार में साफगोई और पारदर्शिता तो होनी ही चाहिए।

बताया जा रहा है कि बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि ने जो कोरोनिल किट बनाई है, वह कोरोना की दवा नहीं है, वह बूस्टर डोज है जो शरीर को कोरोना से लड़ने की ताकत देता है। इस कसौटी पर अगर विचार किया जाए तो रोगों का इलाज व्यक्ति का शरीर खुद करता है, दवाएं तो केवल रोग को ठीक करने में शरीर की मदद करती हैं। आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और यूनानी दवाओं से तो रोग जड़ से ठीक हो जाते हैं लेकिन एलोपैथिक औषधियों से किसी रोग के ठीक हो जाने की गारंटी एलोपैथिक चिकित्सक भी नहीं देते। रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास ही अभीष्ठ होना चाहिए। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता योग, व्यायाम और उचित आहार-विहार से भी बढ़ाई जा सकती है और उचित औषधियों के सेवन से भी। वैसे भी कोई दवा तब बाजार में उतरती है जब उसका सरकारी लैब में परीक्षण हो जाता है। जब उसपर प्रमाण बोर्ड की मुहर लग जाती है।

पतंजलि आयुर्वेद की कोरोना की दवा कोरोनिल और श्वासारि पर आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने कहा है कि यह अच्छी बात है कि योगगुरु बाबा रामदेव ने देश को नई दवा दी है लेकिन नियमानुसार उन्हें औषधि को पहले आयुष मंत्रालय में जांच के लिए देना होगा। परीक्षण के बाद ही मंत्रालय इसके प्रयोग की अनुमति देगा। वैसे भी बिना सरकार के संज्ञान में लाए किसी औषधि की जानकारी सार्वजनिक करना उचित नहीं है।

बाबा रामदेव ने दावा किया है कि कोरोनिल और श्वसारि के इस्तेमाल से सिर्फ 7 दिन में कोरोना मरीज शत-प्रतिशत ठीक हो जाएंगे। उन्होंने इस दवा को अपने पतंजलि केंद्रों पर उतारने की बात कही थी। जिस रोग से दुनिया के तमाम देश परेशान हैं, उसपर अचानक आए किसी दावे पर आंख मूंद कर तो यकीन नहीं किया जा सकता। सरकार ने कहा कि दवा की वैज्ञानिक जांच नहीं हुई है। आयुष मंत्रालय ने दवा के लाइसेंस सहित दवा में प्रयुक्त सामग्री, दवा पर रिसर्च की जगहों, अस्पतालों, प्रोटोकॉल, सैंपल का आकार, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लीयरेंस, क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्रेशन और ट्रायल के परिणाम का विवरण मांगा है। पतंजलि ने आयुष मंत्रालय को अपना 11 पन्ने का जवाब भेज भी दिया है।

इसमें शक नहीं कि बाबा रामदेव से तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां परेशान हैं। उनके उत्पादों के आगे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वामदल और कांग्रेस की बाबा पर हमेशा नजर टेढ़ी ही रही है। ऐसे में बाबा कोई जोखिम तो नहीं लेना चाहेंगे लेकिन अपनी प्रेसवार्ता में उन्होंने कोरोना के इलाज की दवा कहकर अपनी परेशानी बढ़ा ली। खासकर तब जब हरीश रावत के नेतृत्व वाली उत्तराखंड सरकार में उनपर अधोमानक दवाएं बनाने और बेचने के आरोप लग चुके हैं। बेहतर तो यह होता कि वे यह कहते कि उनकी दवा से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और इससे धीरे-धीरे कोरोना को खत्म करने में मदद मिलेगी तो उनका विरोध नहीं होता।

केंद्र सरकार ने पतंजलि आयुर्वेद से कहा है कि आयुर्वेदिक दवाओं समेत सभी दवाओं का प्रचार ड्रग्स एंंड मैजिक रेमेडिज एक्ट-1954 और कोविड-19 महामारी के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा जारी नियमों और निर्देशों के अनुसार लागू होता है। आयुष मंत्रालय ने 21 अप्रैल को जारी अधिसूचना में कोविड-19 पर किए जाने वाले शोध की जरूरतों और तरीकों के बारे में बताया था। यह अधिसूचना कंपनियों को सरकारी मंजूरी के बिना इलाज के दावे करने से रोकती है। भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् ने अप्रैल में आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक दवा कंपनियों के कोविड-19 के इलाज का दावा करने वाले 50 विज्ञापन अभियानों को भ्रामक पाया था और इसकी जानकारी केंद्र सरकार को दी थी। उक्त विज्ञापन अभियान को आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, एवं होम्योपैथी (आयुष) मंत्रालय के एक अप्रैल, 2020 के आदेश का उल्लंघन बताया गया था और आयुष से संबंधित प्रचार और विज्ञापन पर रोक लगाई गई है।

दिलचस्प तथ्य है कि इस सूची में वे इकाइयां भी शामिल हैं जो होम्योपैथिक दवा 'आर्सेनिक एल्बम 30' का प्रचार कोरोना वायरस के इलाज की दवा के रूप में कर रही थीं। हालांकि, इस सूची में कोई बड़ा ब्रांड शामिल नहीं है। इनमें ज्यादातर देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यरत स्थानीय कंपनियां हैं। इसके अलावा भारतीय विज्ञापन मानक परिषद् ने आयुष मंत्रालय के दवा एवं चमत्कारिक उपचार नियमनों के संभावित उल्लंघन के 91 अन्य मामलों को भी भ्रामक करार दिया। इस सूची में वे कंपनियां शामिल हैं जो मधुमेह, कैंसर, यौन समस्याओं, रक्तचाप और मानसिक तनाव के इलाज का दावा कर रही हैं। एएससीआई ने हिंदुस्तान यूनिलीवर के 'फेयर एंड लवली' ब्रांड के एडवांस्ड मल्टी विटामिन से संबंधित विज्ञापन को भी भ्रामक करार दिया है। अप्रैल में जिन अन्य प्रमुख ब्रांडों के विज्ञापन पर परिषद् ने आपत्ति जताई है उनमें एशियन पेंट्स, रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा मोटर्स, एफसीए इंडिया ऑटोमोबाइल्स, ग्रोफर्स, मेकमाईट्रिप और इंडिगो एयरलाइंस शामिल हैं।

लगता है कि कोरोना की दवा को लेकर बाबा रामदेव ने जल्दी कर दी। इससे पहले भी वे कई असाध्य और शाल्य क्रिया योग्य रोगों का इलाज योग के जरिए करने का दावा करते रहे हैं। कोरोना एक गंभीर बीमारी है, इसपर किसी भी तरह के दावे से पूर्व गहन चिंतन और मनन की जरूरत है। एक छोटी-सी गलती देश को खतरे में डाल सकती है। बाबा रामदेव को अपनी औषधि को बाजार में उतारने से पूर्व इसका परीक्षण कर लेना चाहिए। सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय लेकर ही उन्हें इस दवा को बाजार में उतारना चाहिए।

सियाराम पांडेय